तुम्हें पढ़ना चाहता हूँ।
थोड़ा नही तुम्हें पुरा पढ़ना चाहता हूँ
जब से मिली हो रोज पढ़ता हूँ
न तुम्हारे पेज खत्म हो रहे हैं
और न खूबियाँ
आँखों के बारे मे पढ़ रहा था
लगा जैसे गहरा है समंदर से भी ज्यादा
ओष्ठ जैसे दो पंखुड़ी हो गुलाब के
और सुगंध आती है गर्दन से तुम्हारे
वक्ष, जैसे हरा-भरा बगीचा
खिला कमल के फूल है श्रोणि
मछलिदार- सा जाँघ सुनहरा लगा है
पढ़ा पैर को भी मैंने गहराई से
अब प्यार से चूमना चाहता हूँ
थोड़ा नहीं तुम्हें पुरा पढ़ना चाहता हूँ।
-- Virendra Kumar Vidyarthi
| थोड़ा नही तुम्हें पुरा पढ़ना चाहता हूँ |

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