वृक्ष
वृक्ष नाम छोटा
पर काया काम विशाल,
चलने मे लाचार,
बोलने मे लाचार,
एक जगह रह कर
ये जब बनता है मददगार
तभी हम निर्माण कर पाते हैं
एक खुशहाल परिवार,
इधर-काटा-उधर काटा
पति-शाखा सारे काट दिये
फिर भी न मानता हार
फिर से ये अपने ऊपर
उगाता पति हजारो हजार,
किया गया बार-बार प्रहार
पर बुरा न मानता एक भी बार
सोचता है, मै जो रूठ जाऊँ
कैसे जीवित रह पायेगा
जीव-जंतु और समाज-संसार ।
✍️Virendra Kumar Vidyarthi
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| वृक्ष |


बहुत सुंदर कविता है
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