प्रकृति ही मालिक है
प्रकृति हीं मालिक है
उँगली से बंधकर, कठपुतली बनकरनाच रहे थे मालिक के इशारे पर
टूट गई डोरी, खत्म हो गया तमाशे
सन्नाटा छाया है चौराहे पर
सुनो गौर से,
मालिक कुछ कह रहा है
नजरअंदाज किये बगैर देखो
मालिक बहुत प्रताड़ना सह रहा है
गलती कर बैठे,
संसार को किराये का घर समझने का
कुछ और बुद्धि कमाकर
सजा देते इस घर को
शायद, मालिक मोहलत देता
इस घर मे, कुछ और दिन ठहरने का
![]() |
प्रकृति हीं मालिक है |





