22 जून 2021

जून 22, 2021

प्रकृति ही मालिक है

प्रकृति हीं मालिक है 

उँगली से बंधकर, कठपुतली बनकर
नाच रहे थे मालिक के इशारे पर
टूट गई डोरी, खत्म हो गया तमाशे
सन्नाटा छाया है चौराहे पर
सुनो गौर से, 
मालिक कुछ कह रहा है
नजरअंदाज किये बगैर देखो
मालिक बहुत प्रताड़ना सह रहा है
गलती कर बैठे,
संसार को किराये का घर समझने का
कुछ और बुद्धि कमाकर
सजा देते इस घर को
शायद, मालिक मोहलत देता
इस घर मे, कुछ और दिन ठहरने का
      ✍️virendra Kumar vidyarthi

प्रकृति हीं मालिक है ✍️virendra Kumar vidyarthi

प्रकृति हीं मालिक है 



26 मार्च 2021

मार्च 26, 2021

Speech on Independence

स्वतंत्रता दिवस पर भाषण 

स्वतंत्रता दिवस पर भाषण by Virendra Kumar Vidyarthi
भारत का स्वतंत्रता दिवस

        आज बहुत ही खुशी का दिन है, आज के दिन ही हमें आजादी मिली थी। इस आजादी के खातिर अनगिनत वीरों ने अपनी लहू की नदी बहा दी। आज हम सब स्वतंत्र रूप से तिरंगा फहरा रहें हैं तो सिर्फ उन वीरों के वजह से जिन्होंने कभी ये नहीं कहा की हमे जीना है, यहाँ तक की जब भगत सिंह से जेल में एक कैदी ने पूछा की - एसेंबली में बम फेकने के बाद अपनी बचाव क्यों नहीं की? भगत सिंह ने जवाब दिया - "इंकलाबीयों को मरना ही पड़ता है, मर कर हीं हमारा केस मजबूत होता है, अदालत में अपील करके नहीं। ये सारे क्रांतिकारी आजादी के इतने दीवाने थे कि तिरंगा को हीं अपना कफ़न मानते थे। तभी तो किसी ने कहा है - 

"जमाने भर मे मिलते हैं आशिक कई,
मगर वतन से खूबसूरत कोई सनम नहीं होता;
नोटो में लिपट कर, सोने में सिमट कर 
मरे हैं शासक कई, 
मगर तिरंगे से खूबसूरत कोई कफ़न नहीं होता।"

हमारे शहीद वीरों ने बस यही सोचकर जंग के मैदान में कूदे थे कि हम मरेंगें तो क्या हुआ, मेरे मरने के बाद लोगों के खून मे उबाल आयेगा, वे जागृत होंगे, उनके अंदर भी लड़ने की हिम्मत और ताकत आयेगी और एकजुट होकर अंग्रेजों को भगाएंगे और हमारा देश आजाद होगा, फिर चारो तरफ खुशी हीं खुशी होगा। तभी तो भगत सिंह ने लिखा है -

"लिख रहा हूँ मैं अंजाम, जिसका कल आगाज आयेगा
मेरे लहू का हर एक कतरा इंकलाब लायेगा
मै रहूं या न रहूं, पर ये वादा है तुमसे मेरे दोस्त
मेरे बाद वतन पर मरने वालों का सैलाब आयेगा।"

अंग्रेज भाग गए, देश आजाद हो गया, पर देशवाशियों को आजादी नहीं मिली। आज भी भुखमरी देखने मिल जाता है। गरीब आज भी रात-दिन काम करने में लगे हैं जैसे पहले लगे होते थे। कारण, कारण ये है की हमारे बीच एकजुटता नहीं है। आज हर एक व्यक्ति नेता बनना चाह रहा है, हर कोई चाह रहा है की हम आगे हों, हर तरफ होड़ लगी है। सामाजिक हो, आर्थिक हो, और सबसे ज्यादा होड़ तो राजनीति में है। आज शहर का गुंडा भी विधायक बना बैठा है, जनता को लूट रहा है। और ये सब हो रहा है 'पुंजितंत्र से', लोकतंत्र से नहीं। प्रजा को पूंजी के बदौलत खरीदा जाता है। और मुर्ख जनता भी वही कर रही है। मुर्गे का - मांस खाकर, दारु पीकर वोट देकर चले आते हैं और गली का चोर बन जाता है गाँव का रखवाला। इसीलिए किसी ने कहा है -

"कभी नोटो के लिए मरे, कभी वोटो के लिए मरे
कभी जात - पात के नाम पर मरे, 
अगर होते वीर भगत सिंह तो कहते, यार सुखदेव, 
हम भी किन लोगों के लिए मरे।"

अगर सच में आत्मा होती है, तो हमारे शहीद यही सोचते होंगे की हम किन लोगों के लिए बलिदान दिया, जो अपने हीं देश को लूट रहा है, अपने ही, अपनों को देखना नहीं चाह रहा है। हर तरफ मक्कारीऔर भ्रष्टाचारी का सियाशत चल रहा है। एक शायरी हमारे देश पर एकदम फिट बैठता है कि -

"हमें तो अपनों ने लुटा, गैरों मे कहां दम था।
मेरी कश्ती थी डूबी वहाँ, जहाँ पानी कम था।।"

आज अपने हीं लोग देश को लूटने मे लगे हैं। भारत किसी दिन सोने का चिड़ियाँ कहा जाता था, और आज लोहे का संदूक बना पड़ा है, जिस पर दिन - प्रतिदिन जंग लगता जा रहा है। और लोग पेंट और विधुत लेपन क्या करेंगे, ग्रीस भी नहीं लगाना चाहते।

                    इसलिए देश के नौजवानों जागो। राष्ट्र ध्वज मे 24 तिलियों वाला चक्र यही बताता है कि हमें एकजुट होकर राष्ट्र की सेवा करनी चाहिए। हमारे बुजुर्ग जो छोड़ कर गए हैं- उसे संवार कर रखें , जो बता कर गए उसपर अमल करे, और जो न कर सकें हम उसे कर दिखाये।मैं इन्हीं चंद शब्दों के साथ अपनी वाणी को विराम देता हूँ। 

******@ जय हिंद! जय भारत!! @******

15 मार्च 2021

मार्च 15, 2021

Bada Pachhtaoge

बड़ा पछताओगे


टैबलेट के दम पे,
लोग जिंदगी जिया करते हैं
तोड़कर पत्ते पेड़  के
बीड़ी पिया करते हैं,
प्रयास किया वृक्ष कटाई रोकने की
जवाब मिला एक लाइन मे,
सड़क बनानी है, मकान बनाना है,
बेचारे बेजुबाँ की भी सुनो कोई,
उसे अगली पीढी की जान बचानी है
दुनिया की पहचान बचाना है,
अभी गुम है, बोलेगा तो भूचाल छायेगा,
एक दिन ऐसा आयेगा, धरती फटेगी
और आसमां समा जायेगा,
मनुष्य उस दिन पछतायेगा,
जिस दिन सड़क के साथ-साथ
पहाड़ भी बनाना पड़ जायेगा ।।

       ✍virendra kumar vidyarthi

मार्च 15, 2021

Paise Kamane Chahata Hu

पैसे कमाना चाहता हूँ 


 जुँ नहीं है बालो में, पर
पापा से पैसे मांगते बख्त
सर खुजलाना पड़ता है, 
छालें पड़े हैं हाथो मे
पर अपनी बेरोजगारी के सामने
उनके दर्द को झुठलाना पड़ता है, 
इन कठोर-कार्यरत हाथों को
आराम फरमाना चाहता हूँ
पैसे कमाना चाहता हूँ
मै भी पैसे कमाना चाहता हूँ,
मक्कारी-भ्रष्टाचारी के खेल में
ईमानदारी कहाँ नौकरी पायेगा, 
वेतन खत्म हो गई
घुस के कर्ज चुकाने मे
लोग खुद के लिए कब कमायेगा, 
मम्मी को साड़ी, और पापा के लिए
कमीज सिलवाना चाहता हूँ
पैसे कमाना चाहता हूँ
मै भी पैसे कमाना चाहता हूँ, 
उम्र बढ़ती जवानी में
नौकरी मिलने की आस नहीं
बीबी हो, बच्चे हो
बहुत आनंदमयी नहीं, बस
दुखरहित परिवार बसाना चाहता हूँ
पैसे कमाना चाहता हूँ
मै भी पैसे कमाना चाहता हूँ, 
याद आती है बचपन की वो आदतें
जो तैयारी के दौरान छुट गया, 
कोई क्यों मुझे बताया नहीं, की
वेकेंसी का, परीक्षा-परिणाम से नाता टूट गया, 
थकान सी महसूस होती है
फॉर्म भरने के पैसे मांगने मे
जींस के पिछले पैकेट मे
पर्स दबाना चाहता हूँ
पैसे कमाना चाहता हूँ
मै भी पैसे कमाना चाहता हूँ । 

               ✍ virendra Kumar vidyarthi

✍ virendra Kumar vidyarthi
✍ virendra Kumar vidyarthi


03 मार्च 2021

मार्च 03, 2021

Poem on Tree in Hindi

वृक्ष


वृक्ष नाम छोटा
पर काया काम विशाल,
चलने मे लाचार,
बोलने मे लाचार,
एक जगह रह कर
ये जब बनता है मददगार
तभी हम निर्माण कर पाते हैं
एक खुशहाल परिवार,

इधर-काटा-उधर काटा
पति-शाखा सारे काट दिये
फिर भी न मानता हार
फिर से ये अपने ऊपर
उगाता पति हजारो हजार,

किया गया बार-बार प्रहार
पर बुरा न मानता एक भी बार
सोचता है, मै जो रूठ जाऊँ
कैसे जीवित रह पायेगा
जीव-जंतु और समाज-संसार ।


           ✍️Virendra Kumar Vidyarthi

वृक्ष- Poem on Tree By:- Virendra Kumar Vidyarthi
वृक्ष

02 जनवरी 2021

जनवरी 02, 2021

हिंदी कविता 'काश कोई चिड़ियाँ'

 काश कोई चिड़ियाँ !

 काश....  कोई चिड़ियाँ,

मेरे कंधे पे आकर बैठती

और मैं, चुगाता उसे दाना,

वो भर पेट खाती खाना 

और मैं, सुनता उसकी मधुर गाना।

फिर उड़ जाती खतम कर के

अपने हिस्से का दाना।

मैं निहारता उसे तब तक,

जब तक वो गुम न हो जाए

आसमान में,

फिर उस दोस्त को

आवाज देता धीरे से,

और वो आकर बैठ जाती

 मेरी पहचान में ।।

                                                              By:- Virendra Kumar


Virendra Kumar